प्रेस विज्ञप्ति
अल-अक़्सा मस्जिद को जलाए जाने की 57वीं बरसी पर “लीग ऑफ़ पार्लियामेंटेरियन्स फ़ॉर अल-क़ुद्स एंड फ़िलिस्तीन”: क़ब्ज़े की लगाई हुई आग अब भी जल रही है, पवित्र स्थलों की सुरक्षा के लिए तत्काल वैश्विक संसदीय कार्रवाई ज़रूरी है
आज 21 अगस्त को पवित्र अल-अक़्सा मस्जिद को जलाए जाने की घटना को 57 साल पूरे हो गए हैं. यह बरसी ऐसे समय में आई है जब अल-अक़्सा मस्जिद, पवित्र शहर अल-क़ुद्स शरीफ़ और पूरे फ़िलिस्तीनी इलाक़ों में इसरायली कार्रवाई अभूतपूर्व रूप से बढ़ गई है. इसके साथ ही ग़ज़ा पट्टी में व्यवस्थित नरसंहार की जंग जारी है और वेस्ट बैंक तथा क़ब्ज़े वाले अल-क़ुद्स शरीफ़ में भी हमले बढ़ रहे हैं. इससे साफ़ होता है कि 1969 में अल-अक़्सा मस्जिद में लगाई गई आग बुझी नहीं है, बल्कि अब इसका दायरा पूरे फ़िलिस्तीनी अस्तित्व को निशाना बनाने तक फैल गया है.
हम, “लीग ऑफ़ पार्लियामेंटेरियन्स फ़ॉर अल-क़ुद्स एंड फ़िलिस्तीन”, इस दर्दनाक बरसी को याद करते हुए निम्नलिखित बातें रखते हैं:
पहला— अलग-अलग रूपों में जलाने के अपराध का जारी रहना: अति-दक्षिणपंथी क़ब्ज़े वाली सरकार द्वारा रोज़ाना किए जा रहे अपराध, क़ब्ज़े वाली सरकार के मंत्रियों और बसने वाले समूहों द्वारा बार-बार अल-अक़्सा मस्जिद में प्रवेश करना, खुले तौर पर तल्मूदी धार्मिक रस्में करना और यहूदीकरण के प्रतीकों को थोपने की कोशिश करना, मस्जिद को जलाए जाने के अपराध का सीधा सिलसिला है. ये क़दम ऐतिहासिक और क़ानूनी रूप से स्थापित मौजूदा स्थिति को बदलने और अल-अक़्सा मस्जिद को समय और स्थान के आधार पर बांटने की एक ख़तरनाक कोशिश हैं.
दूसरा— आक्रामकता के अलग-अलग रूपों का आपस में जुड़ा होना: हम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि पवित्र अल-अक़्सा मस्जिद के ख़िलाफ़ की जा रही आक्रामकता को किसी भी तरह ग़ज़ा पट्टी में क़ब्ज़े वाली ताक़त द्वारा जारी नरसंहार और जातीय सफ़ाए की जंग से अलग नहीं किया जा सकता. इसी तरह वेस्ट बैंक में ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने, ज़मीन ज़ब्त करने और बसने वालों की हिंसा की नीतियां भी इसी सिलसिले का हिस्सा हैं. ये सभी क़दम एक व्यापक “निर्णायक संघर्ष” की योजना के तहत उठाए जा रहे हैं, जिसका उद्देश्य फ़िलिस्तीनी मुद्दे को ख़त्म करना है.
तीसरा— प्रभावी संसदीय क़ानून बनाने की मांग: हम अरब, इस्लामी और दुनिया भर की संसदों से मांग करते हैं कि वे तुरंत केवल निंदा और विरोध तक सीमित रहने के बजाय प्रभावी कार्रवाई और क़ानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ें. इसके लिए क़ब्ज़े वाली ताक़त पर राजनीतिक और आर्थिक प्रतिबंध लगाने के लिए ठोस क़दम उठाए जाएं, उन बसने वाले समूहों को जो अल-अक़्सा मस्जिद का अपमान करते हैं, “आतंकवादी संगठन” घोषित किया जाए और सार्वभौमिक न्यायाधिकार के सिद्धांत का इस्तेमाल करते हुए क़ब्ज़े वाली सरकार के नेताओं के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाए.
चौथा— क़ानूनी और ऐतिहासिक मौजूदा स्थिति का सम्मान: हम एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय क़ानून और अंतरराष्ट्रीय वैधता से जुड़ी प्रस्तावों के सिद्धांतों, ख़ास तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और यूनेस्को के प्रस्तावों के आधार पर, इस बात पर ज़ोर देते हैं कि पवित्र अल-अक़्सा मस्जिद अपने पूरे 144 दूनम, यानी 144,000 वर्ग मीटर क्षेत्रफल के साथ, जिसमें बाब अल-रहमा का नमाज़ स्थल, इसके सभी आंगन, इमारतें और दीवारें शामिल हैं, पूरी तरह से मुसलमानों का इबादत स्थल है और मुसलमानों का विशेष अधिकार है. इसमें न तो समय के आधार पर और न ही स्थान के आधार पर किसी तरह के बंटवारे या साझेदारी की कोई गुंजाइश है.
हम अल-अक़्सा मस्जिद के यहूदीकरण या ज़मीन पर नई वास्तविकताएं थोपने की किसी भी कोशिश को अंतरराष्ट्रीय क़ानून का खुला उल्लंघन मानते हैं.
लीग ऑफ़ पार्लियामेंटेरियन्स फ़ॉर अल-क़ुद्स एंड फ़िलिस्तीन
शुक्रवार, 21 अगस्त 2026